फेक दिया जाता जिसमे पुराना सामान...
या शायद वो सामान जो दिल को न भाये !
कुछ पुराने स्कूल बैग....कुछ पुरानी किताबे,
कुछ पुराने खिलोने.....कुछ पुरानी तस्वीरे.......
कहने को तो ये सब पुराना था
पर शायद जवानी के साथ मेरा बचपन इनके बीना अधूरा था !
पर अब रक्खा भी था क्या इनमे.......
सिवाए लाने के आँखों में आंसू की चंद बूंदों के....
अभी खुद को प्यारी ये वस्तुवे....
चोट सी पहुचती थी दिल को अब मेरे !
पर अब भी हिम्मत नही थी इतनी,
की निकाल फैकू इनको घर से मैं,
सायद इसीलिये रक्खी थी सहज कर,
एक गंदे....अलग कमरे में.
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