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Thursday, May 30, 2013

शाम बढ़ने लगी,

रात होने लगी,

और मैं फिर अकेला रह गया |

ना जाने कब आँख लगी,

ना जाने कब आंसू थमे,

और उजाला हो गया |



Wednesday, May 29, 2013

" कुछ हम बोले.......कुछ तुम बोलो ,

यू ही बात बनती चली जाये |

ना हम पूछे....... ना तुम पूछो ,

और राज खुलते चले जाये ||"

सजदा

सपने में कल एक हूर परी आई,
कहने लगी , उठ् जा........सजदे को तोसे आई |
हो के जुदा अब तोसे,
मै जी कैसे पाऊ ?
आंसू संग बहू,
और माटी में मिल मिल जाऊ |
कहने लगा मैं,
दूर थी तुम पर करीब दिल के रही,
अब तो सोते हुवे भी रहती आँखे मेरी खुली |
सपने में कल एक हूर परी आई,
कहने लगी ,
कैसे रिश्ते है ये और कैसे है नाते,
यही कही पर है सब अपने खो जाते |
दुनिया है छोटी से,
मुझको तो तू अपनी बाहों में पनहा दे,

थोडा रोने दे मुझे,
थोडा सकून दे |
जल जाने दे ये दुनिया ,
मुझे तो अपनी बाहों में पनहा दे |
कहने लगा मै,  
चल कोई नई दुनिया बना ले |
बंद कर आँखे और मुझे उनमें बसा ले ,
ना देखे जग मुझे,
ना मै चाहू देखन |

मुझको सनम तू बस अपना बना ले |

Sunday, May 26, 2013

मेरे ईश्वर मुक्कदर में कुछ ऐसा लिख दे,मैं मांगू हाथ खड़े कर के और तू पूरा कर दे |मेरे ईश्वर मुझे इस काबिल तू बना,जरूरत मंदों की पूरी करू सारी तमन्ना |जो है यतीम उनको प्यार मिले,भूखो को रोटी मिले, बेजुबानों को साहरा मिले |जिनका नही है घर.....उनको सर ढखने की जमींन मिले मेरे अल्लाह मुक्कदर में कुछ ऐसा लिख दे,मैं मांगू हाथ खड़े कर के और तू पूरा कर |  



Thursday, May 23, 2013

खुद ही शुरुवात करके खुद ही हाल पूछता हू,
और वो "ठीक है तुम्हारे बैगर" कह कर दिल दुखा जाती है | 

Tuesday, May 14, 2013

इजहार ए मोहब्बत करू कभी तो मै,
ये जरुरी तो नही कि तुम जवाब दो कुछ मुझे,
ये भी जरुरी नही है कि करो प्यार तुम भी मुझे,
हां इतना तो है कि जवाब मिले,
मेरे दिल को थोडा आराम मिले,
पर सोच कर ये ही रोकू खुद को,
कही जवाब में इनकार मिले,
अब तू ही बता इस दिल की खता,
कैसे धरती और आसमान मिले.
कैसे कोई राज खुले,
कैसे तू अपना बने |

Friday, May 10, 2013

तनहा सफर


शहर से शहर तक दुरिया नापती,

रास्ते में पड़ते जग्ग्लो को ताकती,

जा पहुची थी एक सड़क मेरे गाव तलक,

छोटे बड़े गड्डों की  गहराईयों को झाकती |

डराती धमकाती और कभी कसमे खिलती,

फिर कभी चहलकदमी जैसी गलती ना करने की,

कभी झूमती,मुस्कुराती ,

ख़ुशी में किसी अपने के आने की |

पर उस शहर से गाँव की गली तलक,

नज़ारे थे कई जमी से आसमा तलक,

दीदार भी था,दर्द भी था,

था आइना भी.............

मगर मै था एक अकेला तनहा सफर में.....

जो बैठा था खिड़की से सटी बस कि आखिरी सीट पर |

Thursday, May 2, 2013


मेरी हर बात के है मायने बहुत,

बशर्ते तुम समजो मेरी आँखों में छिपे राज को |