शहर से शहर तक दुरिया नापती,
रास्ते
में पड़ते जग्ग्लो को ताकती,
जा
पहुची थी एक सड़क मेरे गाव तलक,
छोटे
बड़े गड्डों की गहराईयों को झाकती |
डराती धमकाती और कभी कसमे खिलती,
फिर कभी चहलकदमी जैसी गलती ना करने की,
कभी झूमती,मुस्कुराती ,
ख़ुशी में किसी अपने के आने की |
पर उस शहर से गाँव की गली तलक,
नज़ारे थे कई जमी से आसमा तलक,
दीदार भी था,दर्द भी था,
था आइना भी.............
मगर मै था एक अकेला तनहा सफर में.....
जो बैठा था खिड़की से सटी बस कि आखिरी सीट पर |
No comments:
Post a Comment