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Friday, June 7, 2013

हाफ्ते हाफ्ते इस जिंदगी के दौड में,
जाने कब ठहरे किसी अजनबी मोड में |
सोया कुछ यू मैं उस बरगद की छाँव में,
जाने कब शाम हुई उस बरही दोपहर में |
पंछी भी लौटने लगे घर ले दाना चोंच में,
बैसाखियो के साहरे हम भी निकले दौड में |
लौटने पर जैसे पूछने लगी सीढीया घर की,
कहा हो गयी देर आज..........कहा से लोटे हो इतने देर में |
माफ करना फिर ऐसा नही होगा,
जवाब दिया मैंने अपनी दबी से आवाज में |
हैरान था मैं इनके बर्ताव को देखकर,
सोचा कोई आया होगा......
जो वापिस चला गया मुझे घर पर न देखकर |

करने लगी इशारा एक ओट में,
जहा पड़ी थे एक चिठ्ठी चडी धुल में |
शायद फेंक गया होगा........
डाकिया मुझे पाकर ना घर में |
खोला तो पता चला बम का जैसे गोला था ,
घर की नीलामी का बैंक से जो नोटिस था |
 चलिये पुरानी यादो में ले चलता हू आपको,
बरसो से दबे दर्द को बया करता हू आपको |
एक बेटा हुआ करता था मेरा,
शरारती मगर आँखों का तारा हुआ करता था मेरा |
भेजा था शहर के इंजिनियरिंग कोलिज में कुछ बनने के वास्ते ,
पढ़ लिख कर गांव के लिए कुछ करने के वास्ते|
बस इसीलिये बैंक से कर्जा लिया था,
जमीन बेच कर कुछ पैसो का ओर इंतजाम किया था |
खुश था मैं बेटा बाहर पढ़ेगा,
मेरे चंद सपनो को साकार करेगा |
ट्रेनिंग पूरी कर वापिस आ रहा था ट्रेन में,
मरने वालो की लिस्ट में शामिल था नाम उसका मुंबई 26/11कांड में |
उफ़ अब ये सीढीया भी थका देती है,
पुरानी यादे अक्सर अपनों को रुला देती है |
उफ़ ये बारिश भी अभी होनी है ,
रात के शुरुवात आज एक दर्द से होनी है |
शायद आज रात सो नही पाऊगा,

“चंदशेखर” ने बूढ़े बाबा से पूछा..........
और सुबह का क्या ?????
कहने लगे...........
बेटा अगली सुबह शायद अब देख नही पाऊगा |
बस ये कहानी अधूरी ही रहने दीजिए,
आँखों में आंसू अभी बहने दीजिए |
मैं आउगा जल्दी ही लेकर एक नई कहानी,
थोडा अभी इंतजार कीजीये |




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