हां ये ही है मेरा घर......
पीला पुता हुआ, थोडा झुका हुआ...........
बुढा हां शायद बहुत बुढा.............
जो हो चला है अब !
यादो के सहारे ठहरी है.......
अब हर दिवार इसकी..............
वरना शायद कब का गिर चूका होता............
टूट गया होता दिल का हर कोना !!
सोचता हू कुछ मरममत करा दू....
पर लाजमी नही इस बूढ़े को छूना..........
डर लगता है मुझे भी थोडा.......
कही चल ना बसे
ओर मैं "चंद्रशेखर" फिर रह ना जाऊ अकेला...........
ओर मैं "चंद्रशेखर" फिर रह ना जाऊ अकेला...........!!

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